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सोमवार, २६ नोव्हेंबर, २०१८

"रामभरोसे"

..........// रामभरोसे \\…………

जीवन  ईथले  "रामभरोसे" चेहरा   ईथल्या  लोकशाहिचा |

निरोप  मज  देता  हिरमुसतो  का  चेहरा  माझ्या  आईचा ? || ध्रू. ||

करूनी  चाल  लाटांवर  मृत्यु  दडवून  चाहुल  दबकत  आला |

आधुनिक  शस्त्रांनी  विकसनशील  देशाला  बडवून  गेला |

मानवतेला  चिरडून  चेहरा  हसला  आतंकी  पशूतेचा ! निरोप .... || 1 ||

वीरमरण  जणू  अधिकार्यांचे  व्यवस्थेतल्या  चिंधड्या  दावून |

त्याच  व्यवस्थेवरी  विसंबुन  आशा  ऊठली  जरी  सावरून |

जीवनास  आत्ता  किंमत्त  का ?  प्रश्न  हाच  होता  आशेचा ! निरोप ... || 2 ||

जैसे  थे  परी  सुरक्षाच  ती  तशीच  हतबल  आधीसारखी |

ऊडदामाजी  काळे  कळण्या नजर  हवी  परी  रत्नपारखी |

प्रवेशद्वाराविना  स्थानके  जणू  मार्ग  ऊघडा  चोरांचा | निरोप ... || 3 ||

ऊद्गमदात्या  अवैध  वस्त्या  जरी  अनैतिक  त्या  धंद्यांच्या |

रूंदावत  होत्या  शहरांतुन   गिळूनी  पट्ट्या  भुखंडांच्या |

पाणी - घरपट्ट्या  भरूनीहि  नागरिक  दबुनी  देशाचा | निरोप ... || 4 ||

सरकारी  दाखले  मिळवण्या  सुरूच  खेटे  सामान्यांचे |

त्याच  दाखल्यांच्या  परी  हृद्यी  जणू  प्रेम  अवैध  वस्त्यांचे |

प्रश्न  मनी  मग  सुरक्षेस  का  " अजुनहि " चिरडून  भार  मतांचा ?  निरोप ... || 5 ||

होती  खिदळत  विकृतीच  ती  करूनी  हत्या  माणूसकीची |

वर्षे  सरली  कारण  तिजसाठी  खर्चत  माया  कोटिंची |

सुरक्षित  " विकृती "  ईथे  जणू  संदेशच  "अपुल्या"  वृत्तीचा | निरोप ... || 6 ||

खोट्या  पोकळ  व्यवस्थेस  ह्या  बसून  पुन्हा  आतंकी  दणका |

पडून  बळी  दुसर्या  शहरांतुन  ऊडून  तिथे  स्फोटांचा  भडका |

कुंभकर्णी  झोपेतुन  जाहला  घात  पुन्हा  मग  मुंबापुरीचा | निरोप ... || 7 ||

ओढ  घरांची  पावलांस  ज्या  शंका  नव्हती  किंचित  त्यांना |

त्यांच्या  निष्पापी  रक्ताची  आतंकी  हृद्यास  वासना |

मग  पाशवी  त्या  स्फोटांनी  श्वास  ऊखडला  मानवतेचा | निरोप ... || 8 ||

प्रत्येकाच्या  हृद्यस्थाला  धरले  हृद्यी  ज्या  शहराने |

शहरावर  त्या  पाहून  हमला  देश  गलबलून  आघाताने |

भ्रमणध्वनींचे  जाळे  हतबल  भार  झेलण्या  ह्या  चिंतेचा | निरोप ... || 9 ||

क्षेमकुशल  कळण्या  स्वकियांचे  मग  डोळ्यांतुन  प्राण  दाटले |

वृत्तवाहिन्यांवरी  विसंबुन  विश्वासाने  असता  सगळे |

वृत्तवाहिन्या  काहि  गेल्या  श्वास  कोंडूनी  विश्वासाचा |
निरोप ... || 10 ||

किंवा  योग्य  हे  असेल  कारण  नियम  आगळे  ह्या  देशाचे |

बळी  पाहूनी   स्वरूप  ठरते  सदैव  जिथल्या  आघाताचे |

स्फोट  घडविणे  अफवेमधुनी  असेल  धक्का  कुणा  यशाचा | निरोप ... || 11 ||

परी  स्फोटाने  युध्दभुमीची  दाहकता  पोळून  शहराला  |

रक्ताच्या  थारोळी  अवयव  कुठे  हरवूनी  ह्या  देहाला |

विधात्यास  मग  प्रश्न  चुकुन  का  " मी  निर्माता  सैतानाचा ? " निरोप ... || 12 ||

ईतरांना  सावरता  दिसली  परी  मानवता  जख्मी  होऊन |

ऊपचाराआधी  मृत्युची  झुंजच  निर्जीव  कोठे  विव्हळून |

हरूनी  रूग्णालयात  कोणी   "जन्म पोरक्या  परिवारांचा" ! निरोप ...|| 13 ||

हात  पोरका  फटित  मिळूनी  काळरात्रीच्या  दुसर्या  दिवशी |

पिळवटणार्या  प्रश्नांच्या  त्या  हृद्यावर  कोसळल्या  राशी |

धडपडेल  का  बाळच  कुठले  हात  न  दिसूनी  तो  मायेचा ? निरोप ... || 14 ||

लेक  लाडकी  होरपळून  का  हाताच्या  प्रेमळ  छत्राविण ?

माय - बाप  कोसळतील  थकूनी  कुठे  एकल्या  त्या  काठीवीण ?

एकच  ऊत्तर  दिसले  हतबल   "तिथे  हात  जो  सामान्याचा" | निरोप ... || 15 ||

राजकारण्यांना  देशातील  जो  जिवलग  मतदानापुरता |

त्या  हाताच्या  रेषांवर  जो  मृत्यु  का  मग  त्याच्यापुरता ?

येतो ?........ येतो  म्हणता  जिभ  धडपडे  निरोप  घेताना  घरच्यांचा |

निरोप  मज  देता  हिरमुसतो  का  चेहरा  माझ्या  आईचा ? || 16 ||

- मकरंद सुधाकर पाटोळे.

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